🌹ॐ खड्गं चक्र-गदेषु-चाप-परिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सरवाङ्गभूषावृताम्। नीलाश्म-द्युतिमास्य-पाददशकां सेवेमहाकालिकां यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधु कैटभम्।🌹
🌹भावार्थ:- भगवान विष्णु के क्षीरसागर में शयन करने पर महाबलवान दैत्य मधु और कैटभ के संहार निमित्त पद्मयोनि ब्रह्माजी ने जिनकी स्तुति की थी, उन महाकाली देवी का मैं स्मरण करता हूँ। वे अपनी दस भुजाओं में खड्ग,चक्र, गदा,बाण,धनुष,परिघ (फेंक कर चलाया जानेवाला एक प्राचीन अस्त्र) शूल,भुशुण्डि, मस्तक और शंख धारण करती हैं। वह तीन नेत्रों से युक्त हैं और उनके सम्पूर्ण अंगों में दिव्य आभूषण पड़े हैं। नीलमणि के समान उनकी आभा है एवं वे दशमुखी तथा दस पादों वाली हैं। 🌹

No comments:
Post a Comment