🌷उद्यत्कोटिदिवाकराभमनिशं शङ्खं गदां पंङ्कजं चक्रं बिभ्रतमिन्दिरावसुमतीसंशोभिपार्श्वद्वयम्।
कोटीराङ्गदहारकुण्डलधरं पीताम्बरं कौस्तुभैर्दीप्तं विश्वधरं स्ववक्षसि लसच्छ्रीवत्सचिह्नं भजे।🌷
🌷भावार्थ:- उदीयमान करोडों सूर्यके समान प्रभातुल्य,अपने चारों हाथों में शंख,गदा,पद्म तथा चक्र धारण किये हुए एवं दोनों भागोंमें में भगवती लक्ष्मी और पृथ्वीदेवी से सुशोभित, किरीट,मुकुट, केयूर,हार और कुण्डलोंसे समलंकृत,कौस्तुभमणि तथा पीताम्बर से देदीप्यमान विग्रहयुक्त एवं वक्षःस्थलपर श्रीवत्सचिह्न धारण किये हुए भगवान विष्णु का मैं निरन्तर स्मरण ध्यान करता हूँ। 🌷
🌺भगवान विष्णु आपका मंगल करें।🌺
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